आज का जीवन बहुत भाग दौड़ का जीवन है, सच तो यह है कि भोजन का भी समय का आभाव है., जबकि भोजन शांत और प्रसन्नचित्त होकर करना चाहिए I जहाँ तक संभव हो निम्नलिखित नियमों का पालन करने का प्रयास करना चाहिए
भोजन करना भी एक यज्ञ है इस नित्य यज्ञ के देवता भगवान वैश्वानर (जठराग्नि) हैं.
अहम् वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः I
प्राणापान समायुक्तःपचम्य अन्नं चतुर्विधिम II
भगवान कहते हैं कि मैं वैश्वानर होकर प्राण और अपान की सहायता से चारों प्रकार के अन्न पचाता हूँ आहार केवल खाद्य वस्तु नहीं बल्कि भगवान् के लिए पूजा सामग्री है I शास्त्रों ने भोजन के कुछ नियम निर्धारित किये है
- खाने से पूर्व अन्नपूर्णा माता की स्तुति करके उनका धन्यवाद करते हुए तथा सभी प्राणियों को भोजन प्राप्त हो ऐसी प्रार्थना करके भोजन भोजन का प्रारम्भ करना चाहिए.
- भोजन प्रारम्भ करने से पूर्व निम्न मन्त्र का जाप करना चाहिए और थोड़ा जल पीना चाहिएI ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना।।
यह भोजन जो ब्रह्म है, अर्पण भी ब्रह्म है और ब्रह्म अर्थात भगवान को अर्पित हैI
- दोनों हाथ पैर मुख अदि धोकर शुद्ध होकर ही भोजन करना चाहिए I
- जूते पहन कर, खड़े होकर ,चलते हुए , मध्य रात्रि या अँधेरे में यथा संभव भोजन नहीं करना चाहिएI
- रात्रि के समय भोजन भरपेट नहीं करना चाहिए.I
- दोपहर भोजन के बाद विश्राम और रात्रि भोजन के बाद टहलना चाहिएI.
कहा गया है
After Lunch sleep a while, After dinner walk a mile
- पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके भोजन करना चाहिए. दक्षिण या पश्चिम की ओर मुख करके यथासंभव भोजन न करेंI
- परिवार के बालकों तथा वृद्धों को भोजन करा कर ही भोजन करना चाहिए.I
- भोजन साफ सुथरे पात्र में एकांत में करना चाहिए. किसी और के साथ या उसके पात्र में भोजन नहीं करना चाहिए I
- परोसे गए अन्न की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए वरन प्रसन्नता पूर्वक भगवान को धन्यवाद करते हुए भोजन करना चाहिए.I
- प्रस्सनता पूर्वक ग्रहण किये गए अन्न से बल और तेज की वृद्धि होती है तथा ईर्ष्या द्वेष जैसे भावों के साथ किये भोजन से विकारों की उत्पत्ति होती है.I
- भोजन में सबसे पहले मीठा फिर खट्टा और तीखा और सबसे बाद में कड़वे पदार्थों का सेवन करना चाहिए. I
- भोजन भगवान को भोग लगा कर ही ग्रहण करना चाहिए. इसे से भोजन प्रसाद बन जाता हैI
- जिससे प्रेम न हो, जो आपसे द्वेष करता हो उसके यहाँ भोजन कदापि नहीं करना चाहिएI
- मल मूत्र का वेग होने पर, कलह का वातावरण होने पर , अधिक शोर में पीपल और बरगद के पेड़ के नीचे भोजन नहीं करना चाहिए I
- किसी का छोड़ा हुआ भोजन नहीं खाना चाहिए I
- कम खाने वाले को आरोग्य, आयु, बल ,सुख और सौंदर्य प्राप्त होता है. I
- कुत्ते का छुआ, श्राद्ध का निकला बासी , बाल गिरा हुआ भोजन नहीं करना चाहिए I
- भोजन बनाने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से मंत्र जपते हुए ही बनी रसोई का भोजन उत्तमं होता है. I
- प्रातः भोजन में पहली रोटी गाय की तथा शाम को आखिरी रोटी कुत्ते की अवश्य निकलना चाहिए. I
- दही तिल और सत्तू का को सायं भोजन में सेवन नहीं करना चाहिए. दो भोजन में काम से काम छह घंटे का अंतर होना चाहिए.
- भोजन के उपरांत भगवान् को धन्यवाद अवश्य करें.I